Wednesday, 12 March 2014
नक्सलवाद का समाधान
बड़े ही दुख का विषय है कि पुनः इतना बड़ा नक्सली हमला हो गया और सरकारों ने बिना संसाधन बिना अधिकारों के जवानों को यहाँ वहाँ कूच करने का आदेश देकर और सांत्वना व बदले की कार्यवाही के खोखले स्वांग रच कर अपने कर्तव्यों की फिर से एक बार इतिश्री कर ली।
दो बातें स्पष्ट हैं-
१) केन्द्र सरकार इस समस्या के प्रति गम्भीर नहीं है। क्योंकि इस समस्या को लंबे समय से पाश्चात्य शक्तियों व चर्च तथा अब अरबी प्रभाव में कांग्रेस,क्षेत्रवादी दलों व सबसे बड़े देशद्रोही वामपंथियों ने अन्य समस्याओं की ही तरह इसे न केवल जन्म दिया है अपितु जानबूझकर पनपने भी दिया है ताकि अशांत अविकसित देश में वह तिकड़म से बारबार शासन में आते रहें एवं विकासहीन दारिद्र्य की स्थिति से धर्मांतरण कराया जाये(जो धड़ल्ले से हो भी रहा है) तथा अंततोगत्वा भारतवर्ष को कई छोटे टुकड़ों में बाँट कर हरसंभव दोहन किया जाये।
२) तो इस समस्या का यह नहीं कि जनता को बरगलाने को सैनिकों के हाथ मुँह बांध उन्हें एकतरफा युद्ध में गाजर मूली के समान कटने भेजा जाये और इन्हीं सब कारणों से भारतीय सेना ने इसम घटिया चक्रव्यूह में फँसने से मना कर दिया क्योंकि सेना इस कृत्रिम समस्या का कोई समाधान ही नहीं है(बेवजह गाज तो गिर रही है गुलाम अर्धसैनिक बलों विशेषकर के°रि°पु°बल(CRPF) पर।
बल्कि सरल किंतु कठोर तथा चिरस्थायी समाधान यह है कि भारतवर्ष में बाहर से आने वाले प्रत्येक धन की सशक्त निगरानी हो; सभी संलिप्त समर्थकों, विचारकों, नेताओं,दलों व संगठनों पर चुनचुनकर त्वरित एवम् कठोरतम कार्रवाई(मृत्युदंड तक भी) हो। फिर यह रक्तबीज रूपी माओवादी नक्सली समस्या कम से कम रक्तपात से समाप्त हो जायेगी।
जय सनातन धर्म! जय भारतवर्ष!
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